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आज का निबंध


भ्रष्टाचार


भ्रष्टाचार संस्कृत भाषा के दो शब्द “भ्रष्ट” और “आचार” से मिलकर बना है। भ्रष्ट का अर्थ होता है - नीच गिरा हुआ पतित जिसने अपने कर्तव्य को छोड़ दिया है तथा -आचार शब्द का अर्थ होता है - आचरण, चरित्र, चाल-चलन, व्यवहार आदि। अतएव भ्रष्टाचार का अर्थ है - गिरा आचरण या चरित्र और भ्रष्टाचारी का अर्थ है- ऐसा व्यक्ति जिसने अपने कर्तव्य की अवहेलना करके निजी स्वार्थ के लिए कुछ कार्य किए है, जिनकी उससे अपेक्षा नही थी। आजकल स्वतंत्र भारत में यह शब्द प्राय नेताओ, जमाखोरो, चोरबाजारियों , मुनाफाखोरों आदि के लिए ज्यादा प्रयोग किया जाता है । अंग्रेजी के “करप्शन“ (Corruption) को ही हिन्दी में भ्रष्टाचार कहा जाता है तथा नई सभ्यता एवं भोगवादी मनोवृति को भ्रष्टाचार की जननी माना जाता है । भ्रष्टाचार अनेक प्रकार का होता है तथा इसके करने वाले भी अलग-अलग तरीके से भ्रष्टाचारी करते है। जैसे, आप किसी किराने वाले को लीजिए, जो पिसा धनिया या हल्दी बेचता है । वह धनिया में घोड़े की लीद तथा हल्दी में मुल्तानी मिट्टी मिलाकर अपना मुनाफा बढ़ाता है और लोगो को जहर खिलाता है। यह मिलावट का काम भ्रष्टाचार है। दूध में आजकल यूरिया और डिटर्जेन्ट पाउडर मिलाने की बात सामने आने लगी है, यह भी भ्रष्टाचार है। बिहार में भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए है। यूरिया आयात घोटाला भी एक भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया है। केन्द्र के कुछ मंत्रियो के काले -कारनामें चर्चा का विषय बने हुए है। सत्ता के मोह ने बेशर्मी ओढ़ रखी है। लोगो ने राजनीति पकड़ कर ऐसे पद हथिया लिए है, जिन पर कभी इस देश के महान नेता सरदार बल्लभभाई पटेल, श्री रफी अहमद किदवई, पं. गोविन्द बल्लभ पंत जैसे लोग सुशोभित हुए थे। आज त्याग, जनसेवा, परोपकार, लोकहित तथा देशभक्ति के नाम पर नही, वरन् लोग आत्महित, जातिहित, स्ववर्गहित र सब से ज्यादा समाज विरोधी तत्वो का हित करके नेतागण अपनी कुर्सी के पाए मजबूत कर रहे है। उत्तर प्रदेश में कुर्सी की होड़ तथा एक विशेष जाति को फायदा पहुचाने की जो रिपोर्ट सामने आई है उससे प्रत्येक सुसंस्कृत देशवासी का सिर शर्म से झुक जाता है। इस देश में भ्रष्टाचार की आंधी आई हुई है, जिसमें मंत्री से लेकर संतरी तक अपनी जेबें भरने में लगे हुए है।

भ्रष्टाचार को आप कैन्सर का रोग कह सकते है, जिस प्रकार कैन्सर रोग शरीर की तंत्र प्रणाली को जकड़ कर मनुष्य को निर्जीव कर देता है , ठीक उसी प्रकार भ्रष्टाचार हमारे देश की अर्थव्यवस्था को पंगू बना रहा है। शायद ही कोई ऐसा विभाग तथा व्यक्ति बाकी बचा हो जो भाष्टाचार में शामिल न हो। गांव में लेखपाल अथवा पटवारी तक यह करते सुने जाते है कि जब हमारे नेता पैसा लेते है, तो हम पैसा क्यो न लें। इस भ्रष्टाचार से सराबोर व्यवस्थित को सदाचार की ओर ले जाने का साहस करना आकाश से तारे तोड़ कर लाने जैसा असंभव बन गया है।

लोकतंत्र अथवा जनता के राज में भारत इस हद तक भ्रषटाचार के मकड़जाल में फंस जाएगा, इसकी कल्पना शायद गांधीजी ने कभी न की होगी। स्वतंत्रता के अभी आठ दशक भी नही बीते किन्तु हम उन अत्याचारो को भूल गए है, जो इस देश मे मुगलो तथा अंग्रेजो शासको द्वारा किए गये थे। आज कुर्सी की भूख ने हमें अंधा बनाया हुआ है । हम भ्रष्ट होकर अपने दायित्व देशहित तथा भावी पीढ़ी के कल्याण की उपेक्षा कर रहे है। देश चाहे धरातल में चला जाए आज हमें विल्कुल चिन्ता नही है। प्रतिभाओ का पलायन हो रहा है तथा बड़े-बड़े वैज्ञानिक, इंजीनियरो, डाँक्टरो आदि की उपेक्षा करके वोट बैंक बनाने को प्रमुखता दी जा रही है। कुछ दिनो से सैनिको की खराब स्थिति ओर उनकी नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव करके स्थिति को सुधारने का दावा किया जा रहा है परन्तु वास्तविक स्थिति कुछ और ही मालूम पड़ता है। पड़ोसी देशो की रक्षा बजट में बढ़ोतरी भी देश के लिए चिन्ता का विषय है। मनुष्यो में राजनेता बड़ी भयावह हस्ती होता है, वह कब क्या कर डाले नहीं कहा जा सकता। राजनेता जब व्यवसायिक राजनीति करने लगता है तो उसकी आखों में स्वार्थ बस जाता है । वह हर काम में अपना हित ढूढ़ता है तथा उसके लिए भ्रष्ट या निषिद्ध जो भी काम उसे करना पड़े जरूर करता है। एक का रोग दूसरे पर चढ़ने लगने लगता है और इस प्रकार सारी राजनीति सिद्धांतो की नहीं, अपितु भ्रष्टाचार की राजनीति बन जाती है । शिक्षा, स्वास्थ्य लोक निर्माण, लोक कल्याण, सुरक्षा, खाद्य, जलापूर्ति, बिजली, कृषि और न जाने कितने बिभाग है , जहा कहीं न कही कोई न कोई गोलमाल जरूर है। ऐसी स्थिति में अब पुनः चिन्तन की जरूरत है ताकि भावी पीढ़ी देश को सही दिशा दे सके। भ्रष्टाचार करने की नोबत तब आती है, जब मनुष्य अपनी लालसाएं इतनी ज्यादा बढ़ा लेता है कि उनको पूरा करने की कोशिशो में उसे भ्रष्टाचार की शरण लेनी पड़ती है । बूढ़े-खूसट राजनीतिज्ञ भी यह नही सोचते कि उन्होने तो भरपूर जीवन जी लिया है, कुछ ऐसा काम किया जाए जिससे सारी दुनिया में उनका नाम उनके मरने के बाद भी अमर रहै। रफी साहब की खाद्यनीति को आज भी लोग याद करते है । उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री के रूप में उनका किया गया कार्य 60 वर्ष बीतने के बाद भी किसान गौरव के साथ याद करते है । आज भ्रष्टाचार के मोतियाबिन्द से हमें अच्छाई नजर नही आ रही। इसीलिए सोचना जरूरी है कि भ्रष्टाचार को कैसे मिटाया जाए।

इसके लिए निम्नलिखित उपाय काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैः

(क) लोकपालो को प्रत्येक राज्य, केन्द्रशासित प्रदेश तथा केन्द्र में नियुक्त करके।

(ख) निर्वाचन व्यवस्था को और भी आसान तथा कम खर्चीला बनाया जाए ताकि समाज तथा लोक कल्याण से जुड़े लोग भी चुनावो में भाग ले सके।

(ग) भ्रष्टाचार का अपराधी चाहे कोई भी हो, उसे कठोर से कठोर दण्ड दिया जाए।

आज भ्रष्टाचारियो को महिमामण्डित करने तथा उन्हे ऊचे से ऊचे पद पर प्रतिष्ठित करने का रिवाज चल पड़ा है तथा लोग जातिवादी प्रभाव के कारण ऐसे लोगो का सामाजिक बहिष्कार करने के बजाय उन्हे वोट देकर ऊंचे आसन पर प्रतिष्ठित करके उनकी पूजा करते है। यह स्थिति सोचनीय है। न्यायपालिका तो अपना काम करेगी ही, किन्तु समाज को भी अपने दायित्व का बैध होना चाहिए तथा भ्रष्टाचारियो के खिलाफ जनाक्रोश प्रकट करने में उसे तनिक भी संकोच नही करना चाहिए चाहे कोई भी कितना बड़ा नेता क्यो नही हो। सामाजिक बहिष्कार कानून से भी ज्यादा प्रभावकारी होता है। ऐसे लोगो के खिलाफ जगहृ-जगह प्रदर्शन तथा आन्दोलन किए जाने चाहिए, ताकि भ्रष्टाचारियों को पता चले कि उनके काले कारनामें दुनिया जान चुकी है और जनता उनसे नफरत करती है। हमारे देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि जहां चाणक्य जैसे प्रतिनिधि झोपड़ी में रहकर चन्द्रगुप्त का साम्राज्य चलाते थे, वाल्मिकी जैसे ऋषि वन में रहकर भगवान राम के पुत्रो को शिक्षा देते थे। तथा आदि महाकाव्य रामायण की रचना करते थे, आज उन्ही के प्रतिनिधि वातानुकुलित डिब्बो में यात्रा करते है, वातानुकुलित घरो में रहते है और उनके भ्रष्टाचार की हद यह है कि वे पशुओ का चारा तथा मुर्गियो का दाना तक हजम कर जाते है।

समय अवश्य करवट बदलता है । न्यायपालिका तो अपने कर्तव्य का पालन करती ही है, यदि इसी प्रकार कार्यपालिका भी दबावो और बन्धनो से मुक्त होकर काम करने लगे तो भ्रष्टाचार रूपी दानव-समाप्ति की संभावना काफी बढ़ जाएगा।